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Plants & Projects

Technology & Green Initiatives

प्रौद्योगिकी और हरित पहलें

स्वच्छ प्रौद्योगिकी को अपनाने के जरिये पर्यावरण की देखभाल

मुंद्रा यूएमपीपी देश की ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सरकार की रणनीतिक योजना का हिस्सा है. इसके अलावा, यह आईएफसी के मानदंडों के अनुरूप है. सीजीपीएल पूरी तरह समझता है कि वर्तमान परिदृष्य में विकास और जलवायु परिवर्तन की चिंताओं के बीच सही संतुलन बनाना महत्वपूर्ण है और मुंद्रा यूएमपीपी उसी दिशा में एक कदम है.

सीजीपीएल की मूल कंपनी टाटा पावर हमेशा से ही बेहतर उपयुक्त तकनीक की अगुवाई करने वाली कंपनी रही है और मुंद्रा यूएमपीपी अभी तक उसी का एक और उदाहरण है। मुंद्रा यूएमपीपी में कई नई और उन्नत तकनीकी पहलें हैं, जिनमें से कुछ नीचे दिए गए अनुभागों में उल्लिखित हैं।

  • यह परियोजना सुपरक्रिटिकल प्रौद्योगिकी का उपयोग करती है। यह तकनीक और इकाई के आकार का चुनाव परियोजना के लिए ईंधन बचाने में मदद करेगी और नियमित कोयला-आधारित बिजली स्टेशनों की तुलना में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाएगी।
  • ऊर्जा उत्पादन के प्रति किलोवाट घंटे में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन 750 ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड प्रति किलोवाट है, जबकि भारत में कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के लिए 1,259 ग्राम कॉर्बन डाई ऑक्साइड / किलोवाट प्रति घंटा का राष्ट्रीय औसत है।
  • आयातित कोयले का चयन सल्फर उत्सर्जन को काफी कम करता है। संयंत्र कोयले में निर्धारित 1% सल्फर और 10% राख सामग्री की तुलना में काफी कम उपयोग करेगा।

सुपर क्रिटिकल फायदे :

  • सुपरक्रिटिकल 800 मेगावाट इकाइयों का 'एक बार' उपयोग होने वाला बॉयलर, 500 मेगावाट की सब क्रिटिकल इकाइयों में 'पुनर्प्रयोग' प्रकार के बॉयलर के विपरीत है।
  • सुपरक्रिटिकल 500 मेगावाट बॉयलरों की तुलना में बायलर की डिज़ाइन दक्षता 800 मेगावाट अधिक है।
  • डिजाईन में इन सुधारों से 500 मेगावाट सब-क्रिटिकल इकाइयों की तुलना में 800 सुपरक्रिटिकल इकाइयों में प्रति मेगावाट बिजली उत्पादन में कम ईंधन की खपत होती है.

हरित पहलें

हरित पट्टी के विकास का चरण
हरित पट्टी का विकास
चार फीट ऊंचाई तक के वृक्ष
  • टाउनशिप परियोजना के लिए अपनी ठोस कचरा प्रबंधन पहल के हिस्से के तौर पर सीजीपीएल ने 300 किलोग्राम प्रतिदिन क्षमता का बायोगैस प्लांट स्थापित किया है और उसका परिचालन कर रहा है. सीजीपीएल अक्षय ऊर्जा संसाधनों का भी उपयोग कर रहा है.
  • इस संयंत्र से उत्पन्न सभी कोयले की राख को सिलोस और तालाबों में संयंत्र परिसर के अंदर एकत्र किया जाता है। सूखी राख को बंद और सील थोक माल के रूप में सीमेंट उद्योग ले जाया जाता है। टाटा पावर ने राख को संग्रहित करने के लिए एक अच्छी तरह से डिजाइन किया हुआ और अस्तर वाला तालाब बनाया है जो केवल एक बैकअप व्यवस्था है और इस विषय पर भारत सरकार के दिशानिर्देशों के अनुसार इसका उपयोग नहीं किया जाता।
  • इस सीजीपीएल कॉम्प्लेक्स ने अपने कार्बन फुटप्रिंट को कम करने और बिजली उत्पादन को बढ़ावा देने के इरादे के साथ, कई दृष्टिकोण अपनाए हैं, जिसमें पानी के प्रवाह (निर्माणाधीन) के दोहन के लिए आउटफॉल चैनल में एक माइक्रो-हाइडल प्लांट स्थापित करना शामिल है, और रसोई में उपयोगी गर्म पानी की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बस्ती में एक सौर संयंत्र की स्थापना करना भी शामिल है।
  • पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अपने प्रयासों को जारी रखते हुए, सीजीपीएल 430.4 एकड़ भूमि पर वृहद वृक्षारोपण परियोजना कार्यक्रम शुरू करेगा और कुल 10,76,000 वृक्ष लगाए जाएंगे।
  • सीजीपीएल कोयला वाहक और भंडार से निकलने वाले उत्सर्जन को रोकने के लिए बिजली संयंत्र और कोयला यार्ड की सीमा के साथ एक 100 मीटर चौड़ाई की परिधीय ग्रीन बेल्ट विकसित कर रहा है और 9 मीटर ऊंचाई के पवन अवरोध भी स्थापित किए जा रहे हैं।
  • सीजीपीएल द्वारा हरित पट्टी क्षेत्र में अतिरिक्त उपचारित जल के पुनः प्रयोग के द्वारा “मानवनिर्मित तालाब” बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं. तालाबों को स्थानीय और प्रवासी पक्षियों की प्रजातियों के लिए पारिस्थितिकी संरक्षण क्षेत्र के रूप में विकसित किया जा रहा है।
मिट्टी उत्सर्जक के प्रयोग से सिंचाई
पवन अवरोधक
मानव निर्मित तालाब

पर्यावरण जागरूकता अभियान

सीजीपीएल कर्मचारियों, श्रमिकों और पड़ोसी समुदायों के बीच पर्यावरण जागरूकता को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाता है। इसके लिए पड़ोसी गांवों में विभिन्न प्रचार गतिविधियां आयोजित की जाती हैं।

हर साल “पर्यावरण दिवस” बड़े धूम-धाम और व्यापक भागीदारी के साथ मनाया जाता है. इस अवसर पर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित होते हैं, जिनमें पौधारोपण, पर्यावरण सम्बंधित नारा लेखन और प्रश्नोत्तरी सम्मिलित हैं. कर्मचारी के परिवारों विशेषकर बच्चों को इन कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इस कार्यक्रम के तहत, स्कूली बच्चों को बिजली संरक्षण पर इस उम्मीद के साथ शिक्षित किया जाता है कि वे ऊर्जा संरक्षण के दूत और चैंपियन बनेंगे।